चेहरा अनजान सा क्यों है
चलते चलते हम थम से गये ,
वह भी खामोश सी हो गई,
परछाई मेरी मेरे अस्तित्व का ही अंश है,
फिर चेहरा अंजान सा क्यों है,
जीवन में एक तरफ सूर्य की रौशनी है. तो दूसरी तरफ काली परछाई भी है ,
रौशनी यश, सम्रद्धि का प्रतिक है, तो काली परछाई हमारे जीवन का नकारात्मक
स्वरुप दिखाती है, दोनों का अस्तित्व हमारे जीवन में कायम है, मगर मजे की बात
यह है की हमारी परछाई हमारे इशारोंपर नाचती है, हम चलते चलते थम से गए तो
वह भी थम सी जाती है,सूर्य की रौशनी हमपर सदैव बरसती रहती है, न तो इसे हम
छुपा सकते है ना ही इसे रोक सकते है।जीवन में यश सम्रद्धि कायम है , अब यह हम
पर है की हम किसपर अपनी श्रद्धा रखते है सूर्य की रौशनी पर या परछाई पर ,
इस पर दो पंक्तिया लिखने की कोशिश की है
धूप जरासी क्या खिल उठी,
परछाई भी मेरी मुझसे ऊपर हो उठी,चलते चलते हम थम से गये ,
वह भी खामोश सी हो गई,
परछाई मेरी मेरे अस्तित्व का ही अंश है,
फिर चेहरा अंजान सा क्यों है,
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