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शुक्रवार, मार्च 03, 2017

वो चुप रहे तो.....


 वो चुप रहे तो.....

हमारे आस पास कई  छोटी छोटी उलझने यूँही मंडराती रहती है, इन  उलझनों का निराकरण सहज सम्भव है ,
अगर संवाद सकारात्मक हो, कई बार तो संवाद होते ही  नहीं है ,और अगर हुए भी तो विसंवाद बननेका डर रहता है ., शब्दोका सकारात्मक सहारा लेना ही पड़ता है.नहीं तो समस्या  और गहरी होती जाती है।   ,  चुप  रहने से बात नहीं  बनती ,   दिल के दाग और गहरे होते जाते है, यह शिकवे अंगार बन के दिलोंको जलाते रहते है ,अगर ऐसा ही रहा तो एक दिन मनका सुनामी उमड़कर बाहर आ ही जाता है, सुनामी की शुरुआत कहा से हुई कोइ नहीं समज  सकता, मौन रहने से समस्या  दूर नहीं हो सकती,शब्दों का चयन कर  इन के माध्यम से हम उलझन को सुलझा सकते है।   शांत कर  सकते है, इसलिए उलझन को सुलझाने में संवाद कमाल  का काम करता   है, मगर संवाद विसंवाद ना बने इसका ध्यान रखना जरुरी है

         
 हम सँभालते रहे की वह नाराज न हो
 और वह इस बात से नाराज है क
 हम सम्हलते क्यों नहीं
                                                   
 उनकी ख़ामोशी भी दिल के दर्द को
 पिघलाती है और उनको ये शिकायत है ,
 की हम कुछ नहीं कहते
                                                    
  एक गहरा सन्नाटा है , और
  दिल के दर्द की चीख सुनाई दे रही है
   यह दर्द भी मेरा सागर जैसा गहरा है,
 
 डर है, कही सुनामी बनकर होंटो तक
  न आ जाये

       


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