कुछ गीले कुछ शिकवे, यूँ ही पनप रहे है ,
मन की इस जंगल में.
कुछ इस क्षण में कुछ उस क्षण में,
या फिर जीवन भर में
या फिर जीवन भर में
करनी थी जो अधूरी सी बातें तुमसे ,
कुछ गीले कुछ शिकवे तैरने लगे,
कुछ गीले कुछ शिकवे तैरने लगे,
बातो के आने से पहले। .
दो कदम चलना ही तो था , शायद!
फ़ासले मिट जाते ,
कुछ गीले कुछ शिकवे फिर कहा जाते।
जीवन कारवाँ आगे बढ़ता ही गया,
कुछ अधूरा सा कोना कुछ अधूरी सी बाते
दिल में लिए |
कुछ गीले कुछ शिकवे अब भी वही खड़े है
एक टिस सीने में दफ़न किये हुए। ...
'मैं ऐसा क्यों हु' यही सवाल अपने से पूछते हुए|
एक टिस सीने में दफ़न किये हुए। ...
'मैं ऐसा क्यों हु' यही सवाल अपने से पूछते हुए|
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