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बुधवार, सितंबर 22, 2021

मैं ऐसे क्यों हूं



 कुछ गीले कुछ शिकवे, यूँ ही पनप रहे है ,
मन की इस जंगल में.        
कुछ इस  क्षण में कुछ उस क्षण में,
या फिर जीवन भर में
 करनी थी जो  अधूरी सी बातें तुमसे ,
      कुछ गीले कुछ शिकवे तैरने लगे, 
  बातो के आने से पहले। . 
 दो कदम चलना ही तो था , शायद! 
फ़ासले  मिट जाते ,
कुछ गीले कुछ  शिकवे फिर कहा जाते।
जीवन कारवाँ आगे बढ़ता ही गया,           
कुछ अधूरा सा कोना कुछ अधूरी सी बाते 
दिल में लिए | 
कुछ गीले कुछ शिकवे अब भी वही खड़े है
एक टिस सीने में दफ़न किये हुए। ...
'मैं ऐसा क्यों हु' यही सवाल अपने से पूछते हुए| 


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