पृष्ठ

बुधवार, सितंबर 15, 2021

दौड़



 जिन्दगी है खेल कोई पास कोई फेल!--- इस खेल में दौड़ना होता है.कभी पैसो के लिए तो कभी सपनों के पीछे, तो कभी धेय के पीछे, इन सपनों के बाद्लों  के पीछे हम दौड़ते ही रहते है. यह सोचकर की ----इन बाद्लोंको हम अभी छू ही ले- मगर हाथ लगाने से पहले ही यह बादल  बिखर जाते है .हमारे सपने चूर हो जाते है. और फिर शुरू होती है एक नई दौड़--------.
   इन्सान  गतिप्रीय   प्राणी है . जितना तेज दौड़ सके दौडिये ---. वरना  दूसरे का आगे जाना तय है.जिन्दगी हमे ताउम्र दौड़ने के लिए मजबूर करती है.,जीवन की यह दौड़ -बहुत तेज हो गई है - जिन्दगी  के सफर की यह ट्रेन इतनी तेज दौड़ती है की  आखोंसे  सभी चित्र धुन्दले नजर आते है .इन्हें  महसूस भी नहीं कर पाते  है की ट्रेन आगे निकल  जाती है. जिन्दगी की दौड़ में हमारे साथ रहती है सिर्फ हमारी परछाई और तनहाई .
   स्रुष्ट्री  को मैंने कभी दौड़ते हुए नहीं देखा. मैंने कभी किसी फूल या पेड़ को एक दिन में खिलते हुए नहीं देखा. सागर  की लहरोंको  वक्त बेवक्त तट  छोड़ते हुए नहीं  देखा. सूर्योदय है तो सूर्यास्त भी है. दिन है तो रात  है. सभी क्रम  एक गति से निर्धारित है. एक ताल है. एक लय है. किसी काम  की कोई जल्दी नहीं पर फिर भी सभी काम परिपूर्ण है. हम भी तो श्रुष्ट्री के पांच रंगों से बने , हाड़ मास के इन्सान है. तो जाहिर है , हमारे सभी काम परिपूर्ण होने चाहिए . क्या हमारे जीवन की गति स्रुष्ट्री  की गति से कदम मिलाकार चलती है . अगर चलती हो तो हमारे  सभी ख्वाब अधूरे से क्यों है?हमारे मन रूपी रथ के घोड़ो की गति  , स्रुष्ट्री  की निर्धारित गति से तेज क्यों दौड़ती है?  हमारा बस चले तो हम सुष्ट्री की गति भी बदल दे.मगर हम यह भूल जाते है की, आखिर हम भी तो स्रुष्ट्री के पावन  स्पर्श से पुलकित है. स्रुष्ट्री   ने हमारे कर्मो की भी तो एक गति निश्चित की है. क्या हम इसे कभी पहचान पाते  है. स्रुष्ट्री  की गति से तालमेल बिठाकर चले तो सफलता निश्चित है. वरना हारने पर खुदखुशी करने वालो की संख्या कम नहीं है.
    दरअसल हमारा लालची मन कर्म का फल तुरंत मिलने की आस लगाये बैठा रहता है. और फल का पीछा करते करते दौड़ में शामिल हो जाता है  . दौड़ जहाँ से शुरू होती है वहा कारंवा बिछुड़ जाने का भय सताता है . . अपनोसे से बिछड़ने का दर्द सताता है. सबसे आगे निकल जाने की भूख इंसानी फितरत है. सपनोके बद्लोंको छूने के लिये  अग्रेसर हमारा मन न जाने कब दौड़ में शामिल हो जाता है ! ---.
दौड़ में हम से कोई आगे  न निकल जाये, यह डर मन को डंख मारता  रहता है. मगर सब से आगे  रहते हुए भी सबसे कब पिछड़ जाये कह  नहीं सकते. यहाँ तो कुछ भी निश्चित नहीं है. निश्चित  है तो बस----, मंजिल की और अग्रसर होते रहना.पुरे विश्वास से पुरे  इरादे से, ------विश्वास से उठाया हुआ हर कदम सफलता की  लम्बी दौड़ आसान  करता है. इस सफर में कई मुसाफिर मिल जाते है . कारवां बन जाता है. और सफलता का ताज पहनने का सौभाग्य भी प्राप्त होता है.
 
   .
.