हम सम्हलते रहे की वह नाराज न हो,
और वह इस बात से ख़फ़ा है की हम
सम्हलते क्यों नहीं।
गीले शिकवे मन की किवाड़ पर दस्तक देते रहे,
खोलकर किवाड़ हम भी उन्हें सहलाते रहे.
मन पर पड़ी दरारे बेवज़ह गहरी होती गई
शब्द तो मिले थे पर जुबा खामोश रही ,
हवा का झोका ही तो थे , वे शब्द तुम्हारे
दिल तोड़कर मेरा ले गये।
महफिल से तुम रुखसत क्या हुए
हम तन्हा रह गये।
रूठ कर चल देना आसा है. यारो,
सम्हलो तो जानो रिश्ते में भी कितनी गहराई है प्यारो।
१५ / ९ / १८ (मेरी कलम से )
और वह इस बात से ख़फ़ा है की हम
सम्हलते क्यों नहीं।
गीले शिकवे मन की किवाड़ पर दस्तक देते रहे,
खोलकर किवाड़ हम भी उन्हें सहलाते रहे.
मन पर पड़ी दरारे बेवज़ह गहरी होती गई
शब्द तो मिले थे पर जुबा खामोश रही ,
हवा का झोका ही तो थे , वे शब्द तुम्हारे
दिल तोड़कर मेरा ले गये।
महफिल से तुम रुखसत क्या हुए
हम तन्हा रह गये।
रूठ कर चल देना आसा है. यारो,
सम्हलो तो जानो रिश्ते में भी कितनी गहराई है प्यारो।
१५ / ९ / १८ (मेरी कलम से )
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