वह बुढ़िया
वह
बुढ़िया मंदिर में रोज दिखाई देती थी.मुझे उससे बहुत बाते करनी थी. वह भी
शायद यंही चाहती थी . उस बुढीया में अजीब सा आकर्षण था. उसकी आखो में
प्यार का अथाह सागर उमड़ रहा था.वह बहूत कृष थी, मगर उत्साह से भरपूर थी
.उसकी बच्चो जैसी भोली हँसी मुझे अच्छी लगाती थी. वह मुझे रोज विभिन्न
रूप में दिखाई देती . कभी बच्च्चो के साथ खिलखिलाते तो कभी हमउम्र के
साथ बाते करते. कभी मंदिर की प्रदक्षिणा लगाती, तो कभी फूल तोडती नजर
आती.झूले परबैठकर शान से वह झुला लेती , उसके यह विवध रूप मेरी आखो में
समां चुके थे।ये सभी रूप मुझमें ताजगी का अहसास दिलाते . ऑफिस जाते
वक्त उसके यह सभी रूप में रोज देखा करती .वह उम्र के अंतिम पड़ाव में थी.
फिर भी उसकी जीवन उर्जा मेरे लिए प्रेरना का स्त्रोत बन गई थी . .
सच बात तो यह थी की उसको देखने की मुझे आदत सी पड़ गयी थी .किसीने मुझे
बताया था 'उसका अपना कोई नही है वह अपने मानस पुत्री के साथ रहती
है.'उसे अपना कोई होने की क्या जरूरत जो सबका हो.! अचानक एक दिन वह
बुढिया मंदिर पर नही दिखी. सोचा शायद कही गई होगी.एक दिन, दो दीन, हप्ता
गुजर गया मगर वह नही दिखाई दी. अब मेरी बेचैनी बढने लगी . कहा गई होगी?
---- मेरी आखे मंदिर में उसे तलाश रही थी .उसके बिना मंदिर सुनासुना लग
रहा था .
मंदिर के चबूतरे पर बैठ गई. आखो से झर झर
आसू बहने लगे.' किसी पराए के लिये क्या रोना', मन कह रहा था. पर आसू बह
रहे थे. मंदिर में झुला अकेले ही हिलोरे ले रहा था. सबकुछ वैसा ही था
.सिर्फ वह रिश्ता नहीं था, जिसने मुझे रुलाया था. इस रिश्ते का कुछ भी तो
नाम नही था .जिसने मुझे रुलाया था.एक अंजान रिश्आखिर एक दिन उसके सथिदारो को मैंने पूछ ही लिया . किसीने कहा "भगवान को
प्यारी हो गई बेचारी. "में वही ता जिसकी महक मंदिर में
अभी भी फैली हुई थी।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें