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बुधवार, नवंबर 01, 2023

आईना कभी झूट नहीं बोलता

 आईना कभी  झूट नहीं  बोलता 

आईना  कभी झूट  नहीं  बोलता ,

चेहरे के हरएक  राज है खोलता.

चेहरे को भी समय नुसार है ढालता ,

सुबह गहरी नींद से उठकर देखा , 

 चेहरा बहुत हसीन था , 

जैसे गुलाब का फूल था ,

दोपहर  में न जाने क्यों ,

आखो में उलझन थी ,

माथेपर शिकायतो की दरारे थी 

रात  होते होते यंही दरारे सिलवटों

 में बदल गई थी ,थकी थकी सी आंखे 

सारे  जंहा का राज खोल रही थी , 

आइना भी कितने रंग है बदलता ,

चेहरे के हर राज है खोलत। . 

मै ढूंढा करू सुबह का वह हसीं चेहरा ,

जैसा गुलाब का हो सहरा।

आखिर राज क्या है यह गहरा ,

क्या आईना  भी पढ़ लेता है मन का चेहरा ?!!!!

 


 

 

 

 

 

 

 


सोमवार, जुलाई 03, 2023

खुशियो को महसूस कीजिये


खुशियों को महसूस कीजिये



 खुशियों  की धूपचांदनी आज मेरे अंगना उतर आई।
मैने दोनों हथेलियों मे  धूपचांदनी को भरना चाहा
वह छुईमुई सी होकर उड़ गयी , खुशिया कहाँ  बंधन में पलती  है!!!!!
मन आँगन में धीरे से उतर आती है ,बाँध के रखना चाहो तो हवा हो जाती है।
वह तो आसपास मंडराती रहती है, तितली की भांति,
बस ! उसे महसूस करने का नजरिया  हमें मिल जाये,
कुछ लम्हें बड़े हसीन  होते है, उन्हें याद  करने की जरूरत नही,
वह मन में उतर आते है, धूप  की चांदनी जैसे, और बस जाते है,
 मन के किनारों  पे कहीं ! ----- छाव बनकर , जीवन की युद्धभूमी
 में वंही छाव  शीतलता का अहसास दिलाती


if I can't give anything to 
others still one thing I can
 give that is pleasant smile










सोमवार, जून 26, 2023

                                                                       
तूफान भीतर है. बाहर तो गहरी शांति है. समुद्र और धरती की गोद में रोज  ही कितने विस्फोट होते है, किसी  को पता भी नहीं चलता है.सतह पर रहने वालो  को लहरों से खेलना भाता है.जिस दिन यह भीतरी स्फोट उमड़कर  बाहर  आता  है. सुनामी बन जाता है. धरती कांप उठने पर कितने ही गावं उजड़ जाते है. तबाही आती है. इसीलिए मन के सुनामी को सहसा बाहर मत आने दीजिये क्यों के यह बाहर आने पर बाहर की गहरी शांति  को नष्ट करता है. संसार में इस समय हिंसा का जो भयानक रूप दिखाई  देता है. यह सब मन के भीतर हुए मानसिक  स्फोट है. जो उमड़कर बाहर आए है. वरना आज  भी बाहर एक गहरी शांति  है. निस्तब्ध मौन है

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शुक्रवार, जून 23, 2023

ऐसी भी बाते होती

ऐसी भी बाते  होती है---



 ऐसी भी बाते  होती है-----

शीशे के सपने  पत्थर की  दुनिया होती है
होटों  पे हंसी  आँखो  में अश्क   तैरते रहते है.
लबों पे ख़ामोशी दिलो में सैलाब होते है.

  ऐसी भी बाते  होती। .....

फूलों  से नाजुक दिल कुम्हलाते रहते है.
ताउम्र घायल जखमो को हम सहलाते रहते है.
जीवन तो जीना सिख लेते है, मन को तड़पता छोड़ देते है

  ऐसी भी बाते  होती

सपनो के रास्ते तलाशते है  सपने धुंदले हो जाते है
कुछ और ही पाना था कुछ और ही बन जाते है

  ऐसी भी बाते  होती है

भीड़ में क्या तलाशता है , जरा जरा सा पगला सा मन ये मेरा
 खुद को ही ढूंढ़ता है   खुद से अंजान राही  अकेला।

गुरुवार, जून 22, 2023

वह बुढ़िया

        वह बुढ़िया                                                      

 वह   बुढ़िया मंदिर में रोज दिखाई देती थी.मुझे उससे बहुत बाते करनी थी. वह भी शायद यंही चाहती थी .  उस बुढीया में अजीब सा  आकर्षण था. उसकी आखो में प्यार का अथाह सागर उमड़ रहा था.वह बहूत कृष थी, मगर उत्साह से भरपूर थी .उसकी बच्चो जैसी भोली हँसी मुझे अच्छी लगाती थी.  वह मुझे रोज  विभिन्न रूप में दिखाई  देती  . कभी बच्च्चो के साथ खिलखिलाते  तो कभी हमउम्र के साथ बाते करते. कभी मंदिर की   प्रदक्षिणा लगाती, तो कभी फूल तोडती नजर आती.झूले परबैठकर शान से  वह झुला लेती ,   उसके यह  विवध रूप मेरी आखो में समां चुके थे।ये  सभी रूप मुझमें   ताजगी का अहसास दिलाते .  ऑफिस जाते वक्त  उसके यह सभी रूप में रोज देखा करती .वह उम्र के अंतिम पड़ाव में थी.  फिर  भी  उसकी जीवन उर्जा मेरे लिए प्रेरना का स्त्रोत बन गई   थी .  .  सच बात तो यह थी की उसको देखने की मुझे    आदत सी पड़ गयी थी .किसीने मुझे बताया  था 'उसका अपना कोई नही है वह अपने मानस   पुत्री के साथ रहती है.'उसे अपना कोई होने की  क्या जरूरत जो सबका हो.!  अचानक  एक दिन वह बुढिया मंदिर पर नही दिखी. सोचा शायद कही   गई होगी.एक दिन, दो दीन, हप्ता गुजर गया मगर वह नही दिखाई दी. अब मेरी बेचैनी  बढने लगी . कहा गई होगी? ---- मेरी आखे मंदिर में उसे तलाश रही थी .उसके बिना मंदिर सुनासुना लग रहा  था .
  मंदिर के चबूतरे पर बैठ  गई. आखो से झर झर आसू बहने लगे.' किसी पराए  के लिये  क्या रोना', मन कह रहा था. पर आसू बह रहे थे. मंदिर में झुला अकेले ही हिलोरे ले रहा था. सबकुछ वैसा ही था .सिर्फ वह रिश्ता नहीं था, जिसने मुझे रुलाया था. इस रिश्ते का कुछ भी तो नाम नही था .जिसने मुझे रुलाया था.एक अंजान  रिश्आखिर एक दिन उसके सथिदारो को मैंने पूछ ही लिया . किसीने कहा "भगवान को प्यारी हो गई बेचारी. "में  वही ता जिसकी महक मंदिर में अभी भी फैली  हुई  थी।

 

                              सखाराम  एक शहरी  बाबु

किसीके कहने पर सखाराम गांव से शहर   आया था.उसे शहर में नौकरी भी मिल गई थी .गांव से शहर आने पर उसने बहुत सी  बाते सीखी थी. शिष्टाचार क्या होता है, वंह जान गया था .शिष्टाचार को शिष्टाचार न कहते हुए 'एटिकेट्स' कहने लगा था. गांव से शहर  आने पर ,पहली बार वह किसी होटल में  गया था. वहा  के सफेद वर्दी धारी ने उसे सलाम मार दिया था. तभी  से थोडा  फुला  हुआ था. अपने दस बाय दस के कमरे में उसने एक पलंग खरीद लिया था. वह दिन में और रात  में उसी पर सोता था. अपने किराए के कमरे में, निचे जमीन वाला भाग याने के ग्राउंड फ्लोअर उसने, चूहा ,. छिपकली, काक्रोच, आदि को बिन किराए से दे रखा था. घर में वहं स्लीपर पहनकर घूमता था. जमीन से उसका रिश्ता  टूट चूका था.
    छोटे मोटे एटिकेट्स तो उसने बहुत जल्दी सिख लिए थे. रंग गोरा होने के  लिए उसने कई  क्रीम इस्तेमाल किये थे. दांत साफ करने के लिए बबूल   के दातुन  की जगह टूथ पेस्ट और ब्रश ने ली थी. पेट भले ही आधा हो, पर कपड़ो पर इस्त्री पूरी होनी चाहिए,  ऐसा उसका मानना था. कभी कभार एखाद  पेग लेने में कोइ हर्ज नहीं ऐसा भी उसका मानना था. अमीर आदमी बनना उसका प्रमुख  सपना था. अमीर आदमी बनने के लिए उसने बहुतसे हत्कंडे अपनाए'. पर निराशा ही हाथ लगी थी तब उसके दोस्त ने उसे सलाह दी थी.'पैसा कमाना हो ,तो थोडा टेढ़ा रास्ता धुन्ड़ना पड़ेगा मेरे यार'! तभी से अपनी दोस्त  की दी हुई सलाह पर चल रहा है.दोस्त से ट्रेनिंग ले रहा है .
   आजकल उसने एक कालर टी.व्. ख़रीदा है .रोज रात  के दो बजे तक पिक्चर देखता है. सुभह देरी से उठता है. कभी कभी बिना नहाये ही  इस्त्र के कपडे पहनकर कामपर चला जाता है. छुट्टी के दिन दिनभर टी.व्. देखता है. जिस में कभी गांव के दर्शन होते है. धरती की  गोद में अठखेलिया  करते उन गावं के बच्चो  में वहं अपने को धुन्ड़ता है. उन बच्चो  को देख कर  उसकी बुझी बुझी सी आखो में चमक आती है. मक्का  व् बाजरे के लहलहाते खेत  देखकर,  उसको अम्मा के हाथ का वह लजीज खाना याद  आता है, तब वह टी. व्. बंद कर के  सो जाता है.



 

बुधवार, जून 21, 2023

बोर होना-----No way

मौजूदा परिस्थिति  में जीवन उबाऊ हो गया है. बोर हो गया है.मुम्बई भाषा में कहे तो  थकेला हो गया है. शब्द तो सामान्य है पर इसके पीछे छुपे अर्थ बड़े गहरे है. बोर होना, यह मन की एक निगेटिव अवस्था  है. कोइ व्यक्ति घर में बैठकर भी बोर नहीं होता और कोई महफिल में  भी बोरियत महसूस करता है.कोइ अधिक वर्कलोड से परेशान  है तो कोई वर्क न होने के कारण परेशान  है. इस बोरियत भरी जिंदगी के अधिकारी हम ही है तो जीवन में नया रंग भरने  का हौसला भी हम ही निर्माण कर सकते है. जब मन   को कोइ रचनात्मक कार्य नहीं दिखाई देता तब मन  बोरियत होने का अहसास कराता  है. 

हमारा मन और दिमाग बहुत रचनात्मक होते है.  मन वही करता व सुनता है जैसे हम उसे सुनाते  है,  बोर होने की वजह से अगर हम  मायूस और उदास है   तो मन वही रचना बार बार दोहराएगा और जब तक हम इस नकारात्मक भाव के प्रभाव में रहेंगे जीवन पर नकारात्मक के बादल मंडराते   रहेंगे.

१) तो अब समय आ  गया है अपने दिमाग  को नया प्रोग्राम देने का, अपने आप से कहेंगे 'परिस्थिति चाहे कैसी  भी हो, मेरा मन हर हाल  में व्यस्त मस्त और स्वस्थ रहता है' ,यह मन्त्र किसी जादू की भांति काम करेगा, और जीवन सचमुच व्यस्त, स्वस्थ और मस्त रहेगा। व्यस्त कार्यो की सूचि में नाख़ून काटने से लेकर कोई बड़ा प्रोजेक्ट भी हो  सकता है. जीवन के सभी छोटे छोटे कार्य आखिर छोटे छोटे प्रोजेक्ट ही तो है.!!!!!

पांच ऐसे उपाय है जो हमें इस बोरियत भरे जीवन से छुटकारा दिला सकते है. 

२)अपने मन, दिमाग व विचारोंको किसी रचनात्मक कार्य में व्यस्त रखने से  हमें बोरियत से बहुत जल्द छुटकारा मिल जाता है. जैसे कोइ नई डिश बनाना, बागवानी करना , कोई मनपसंद किताब पढ़ना,  अपने मन को व्यस्त , स्वस्थ और मस्त  रखने के लिए उसे कोइ रचनात्मक कार्य देना  आवश्यक है. 

३)मन चाहता है खुश रहना, अगर बोरियत महसूस हो रही है तो गत  जीवन की सुखद स्मृतियोंको एक बार फिर से   ताजा  करे. मन ख़ुशी से झूम उठेगा।पुराने अल्बम देखना , अपने किसी पुराने दोस्त को फोन लगाकर उससे बाते  करना। इससे दिमाग बोरियत भरे विचारो से मुक्त हो जायेगा।

 ४)अपने भीतर बसे बचपन को सदा खुश रखने से  जीवन खुशनुमा बनता है. अगर हो  सके तो   

      बचोमें  छोटा   बच्चा बनकर उनके साथ खेले।  

      बोरियत से बचनेका सबसे आसान तरिका है थोडासा  सोशल होना। 

      लोगो के साथ हंसी मजाक करने से,  थोडासा रूमानी होंने  से मन खुश  रहता   है.

५)मन को उदासी और बोरियत भरे विचारोसे दूर करने के लिए कोई  हास्य मूवी देखे 

    हास्य  कार्टून शो देखे. अपने किसी मजाकिया दोस्त से मिले  

   ६)   इतने  उपाय करने पर भी अगर मन नाराज है  तो सावधान हो जाना चाहिए  

        यह डिप्रेशन की पहली स्टेप  हो सकती है.  

                  

 

 

रविवार, जून 18, 2023

बच्चोको इन गुणों से अवगत कराये

बच्चे गीली मिटटी की समान होते है.
 वे वैसे  ही बनते है जैसे हम उन्हे घडते है
.थोड़ी सावधानी उनकी तरफ  रखी जाय, तो हम भी 
उन्हें एक महान व्यक्तिमत दे सकते है.
                                1
 बच्चोमे  में आत्मविश्वास की कमी न हो इसका ख्याल रखे. 
 बच्चो  में  जिम्मेदारी का अहसास बाल्य अवस्था से विकसित करे.
 उन्हें छोटी छोटी जिम्मेदारियोंको निपुणता से करना सीखाये।
 बाल्य अवस्था से उठाये गए यह कदम उन्हें आत्मविश्वास की और 
  ले जायेंगे.
                                2
 अनुशासन का महत्व बच्चो को समझाये  
  अपने लाडले को  हर काम व्यवस्थित करना सीखाये। 
    जैसे ---
    जूते  जगह पर रखना, पेन पेन्सिल का स्थान
   जहा है वही रखना , कपडे अलमारियों में
   सही तरीके से रखना , यह सभी चीजे लगती
    तो मामूली है, पर है बड़े काम की. व्यवहारिक
    जगत में इन आदतों का उन्हें लाभ मिलेगा .
                                          3
       
 मेहनत और बुद्धिमत्ता का मेल जीवन को सफल बनाते है 
  अपने लाडले  को मेहनत का पाठ जरूर सिखाये  
   परन्तु यह भी एहसास दिलाये की अपनी बुद्धि का 
   सही उपयोग करे. मेहनत और बुद्धिमत्ता का मेल 
    जीवन को सफल बनाते है. 
                                             4 
    सफलता और विफलता एक ही सिक्के के दो पहलू है। 
     दोनों को सहज भाव से देखने का साहस बच्चे को दे.
      घर के छोटे मोठे कामो से उन्हें यह सीख  दे
                                             5 
      बच्चे अक्सर चुलबुले स्वभाव के होते है
       काम की सफलता का श्रेय लेने के लिए
       उत्सुक रहते है, ऐसे में  उन्हें धीरज रखने
       की सलाह दे ,कार्य की सफलता  के लिए धीरज
      होना जरुरी है.  
                                     6
      सफलता टीमवर्क के बिना अधूरी  है।
      बच्चों  को सहज होना सिखाये। 
      आज का जमाना टीम वर्क का है।
       बच्चो में ग्रुप में काम करने की आदत विकसीत करे 
       साथ में काम करना और सहीनिर्णय लेना सिखाये।

       यह सभी गुण  बच्चोके मानसिक विकास के
        लिए जरुरी है, हर कोइ चाहता है उनका लाडला
        हस्ता, खेलता, होनहार हो  जीवन में सफल हो।
             

शनिवार, जून 10, 2023

 आँगन का पेड

हमारे आँगन मे एक बड़ा पेड़ था।  जिसमे बहूत सारे  लाल फूल आते थे। कई  सालों तक  यह  सिलसिला चलता  रहा। उस पेड़ को मैंने बड़े प्यार से पाला  था।   कई  लाल फूलों  से श्रृंगारित वह पेड मेरा दुलारा था.  मुझे उस  पेड़ से गहरा लगाव हो गया था. फिर अचानक  ऐसा भी समय आया की वह पेड़ सूखने  लगा।

उसकी  जडे  कमजोर हो गई. कई छोटे  जीव जन्तूने  उस पेड़ को अपना भोजन बना लिया था. नौबत यंहा  तक आई कि  उसे आखिर काटना ही पड़ा। मेरा उस पेड़ से गहरा रिश्ता था.मै  बहुत  व्याकुल मनोदशा में थी. 

कई दिन बीत  गए. फिर एक दिन मेरे ख़ुशी का ठिकाना न रहा ,जब  मैंने  देखा उस पेड़ की जड़ो में  कुछ नई कोपले निकल आई  थी। 

मेरी तरफ हसरत  भरी  नजरो से देख रही थी।   जैसे कह रही   हो "मेरी जड़ो में तुम्हारा प्यार छुपा था ना , देखो मै फिर से प्रगट हो ही गया 

रिश्तो में भी तो  गहरे लगाव की जड़े  होती है.  उन रिश्तो में भी कभी कभी दिमग  लग जाती है.भर भर के प्यार देनेवाला  वह पेड़ अचानक  सुख जाता है।  रिश्तो की जडे  तोड़ दी जाती है.. बड़ा दुःख होता है. मन व्याकुल हो जाता है. 

फिर अचानक नए रिश्ते  जुड़ जाते है।  नए अंदाज में ,! नए रूप में मन की धरती पर लहराते है. धीरे से   कानो में कह जाते है. "मै  वही हु रे पगली".नए रूप में नए अंदाज में।  पुराने रिश्ते कुछ सीख दे जाते।















 










शुक्रवार, जून 09, 2023

श्रद्धा --- रेगिस्तान में छाव जैसी


 श्रद्दा रेगिस्तान में  छाव जैसी 


चिलचिलाती धूप  में पेड़ों की  छाव सुकून देती है,
प्यासे को पानी और भूखे को भोजन संतुष्ट करता है.
श्रुष्टी का स्वभाव है, देना,  और सिर्फ देना, बिना
कोइ फल की अपेक्षा रखते हुए -----
हम  जीवन में हर वक्त सुकून की तलाश में लगे  रहते है,
मगर ऐसा होता कहा है, हमारा जीवन तप्ति हुई धूप में रेगिस्तान
 जैसा बन जाता है, हमारी इच्छाये ,आकांशाए हमारे
जीवन पर बोझ बन जाती है,   जीवन रेगिस्तान बन जाता है,
 तब शुरू होती है ,एक नई खोज ----- शांति की खोज -----!.
जीवन संघर्ष में एक ऐसा चिराग मिल जाये ,जिसे रगड़ते ही
जीवन बोझ हल्का हो जाये सुकून मिल जाये, क्या ऐसा
 चिराग भी अस्तित्व में है--------------?
 उसका  अस्तिव शायद हम में ही है ,! हमारे आस पास, हमारे इर्द गिर्द !
वह है  श्रद्धा का चिराग, श्रद्धा अपने आप पर हो -----
जीवन जीने पर हो, तो जीवन सुरमई बन जाता है,श्रद्धा का दूसरा नाम विश्वास है ,
विश्वास है .तो सफलता भी है,
श्रद्धा और विश्वास से किया गया हर  काम सफलता
की और ले जाता है,
मन तड़पता रहता है, अहंकार में, क्रोध में,  इर्षा  में.
मगर जिस दिन श्रद्धा के बीज इस मन में अंकुरित होते है,
इन सभी अवगुणों का नाश होता है , मन निश्चित और निर्भय हो जाता है,
अपने आप पर पूरा भरोसा कर लेता है  आदमी -------
भारतीय परम्परा में प्रार्थना का बड़ा महत्व है, प्रार्थना
  में श्रद्धा निहीत है, प्रार्थना का फल तभी मिलता है जब
अंतर्मन तक प्रार्थना की पुकार सुनाई देती है ,  विश्व  के
सभी कार्यो में आज भी विश्वास और श्रद्धा मौजूद है जो
रेगिस्तान में छाव  जैसा कार्य कर  रही है,
प्रार्थना का मोल समझकार उसे जीवन में उतारना
बुद्धिमानी और समझदारी की और उठे कदम है।




        

बुधवार, सितंबर 22, 2021

मैं ऐसे क्यों हूं



 कुछ गीले कुछ शिकवे, यूँ ही पनप रहे है ,
मन की इस जंगल में.        
कुछ इस  क्षण में कुछ उस क्षण में,
या फिर जीवन भर में
 करनी थी जो  अधूरी सी बातें तुमसे ,
      कुछ गीले कुछ शिकवे तैरने लगे, 
  बातो के आने से पहले। . 
 दो कदम चलना ही तो था , शायद! 
फ़ासले  मिट जाते ,
कुछ गीले कुछ  शिकवे फिर कहा जाते।
जीवन कारवाँ आगे बढ़ता ही गया,           
कुछ अधूरा सा कोना कुछ अधूरी सी बाते 
दिल में लिए | 
कुछ गीले कुछ शिकवे अब भी वही खड़े है
एक टिस सीने में दफ़न किये हुए। ...
'मैं ऐसा क्यों हु' यही सवाल अपने से पूछते हुए| 


मंगलवार, सितंबर 21, 2021

स्वस्थिति मजबूत हो।

 

पार्ट १

                                               

जीवन एक चुनौती ( Life is challenge.) 

 
   कहानिया किताबे हम सभी पढ़ते रहते है.मगर ताज्जुब की बात यहं  है की अपने ही
जीवन की कहानी हम गढ़ते रहते है औरहमें पता भी नहीं होता है. जीवन की कहानी
 लिखते वक्त हाथ में कलम और स्याही नहीं रहती  है ना ही  कागज | कच्ची उम्र
से शुरू होने वाली यंह  कहानी, क्लाइमेक्स तक आतेआते नॉवेल  का रूप धारण कर लेती है.
वक्त करवट लेता रहता है.परिस्थिति बदलती रहती है.हर परिस्थिती   में हम
खुद को अंजान  पाते  है.हमारा रोल  समझ ही नहींपाते है  की दुसरी चुनौती सामने खड़ी  हो जाती है.
जीवन में उलझन यही  से शुरू हो जाती  है. हर परिस्थिती  में विचलित होते रहते है. अशांति की दलदल में खींचता
जाता है बेचारा मन!!! कभी भय  तो कभीअनिश्तिंता ,कभी अभाव तो कभी दबाव में जीवन ढोते  रहते है.
नकारात्मक परिस्थिया  हम पर हावी होती रहती है , हम परिस्थितीके बोझ के निचे दब जाते है. ऐसा इसलिए भी होता है की ( पर +स्थिति का चिंतन हम करते रहते है स्वस्थिति (स्व+स्थिति ) को नजरअंदाज
करते रहते है ,परिस्थिति के आगे स्वस्थिति अगर मजबूत हो तो परिस्थिती
चाहे कितनी भी बड़ी क्यों न हो मोम  की तरह पिघल जाती है , अपना रोल समझना जरुरी है





बुधवार, सितंबर 15, 2021

दौड़



 जिन्दगी है खेल कोई पास कोई फेल!--- इस खेल में दौड़ना होता है.कभी पैसो के लिए तो कभी सपनों के पीछे, तो कभी धेय के पीछे, इन सपनों के बाद्लों  के पीछे हम दौड़ते ही रहते है. यह सोचकर की ----इन बाद्लोंको हम अभी छू ही ले- मगर हाथ लगाने से पहले ही यह बादल  बिखर जाते है .हमारे सपने चूर हो जाते है. और फिर शुरू होती है एक नई दौड़--------.
   इन्सान  गतिप्रीय   प्राणी है . जितना तेज दौड़ सके दौडिये ---. वरना  दूसरे का आगे जाना तय है.जिन्दगी हमे ताउम्र दौड़ने के लिए मजबूर करती है.,जीवन की यह दौड़ -बहुत तेज हो गई है - जिन्दगी  के सफर की यह ट्रेन इतनी तेज दौड़ती है की  आखोंसे  सभी चित्र धुन्दले नजर आते है .इन्हें  महसूस भी नहीं कर पाते  है की ट्रेन आगे निकल  जाती है. जिन्दगी की दौड़ में हमारे साथ रहती है सिर्फ हमारी परछाई और तनहाई .
   स्रुष्ट्री  को मैंने कभी दौड़ते हुए नहीं देखा. मैंने कभी किसी फूल या पेड़ को एक दिन में खिलते हुए नहीं देखा. सागर  की लहरोंको  वक्त बेवक्त तट  छोड़ते हुए नहीं  देखा. सूर्योदय है तो सूर्यास्त भी है. दिन है तो रात  है. सभी क्रम  एक गति से निर्धारित है. एक ताल है. एक लय है. किसी काम  की कोई जल्दी नहीं पर फिर भी सभी काम परिपूर्ण है. हम भी तो श्रुष्ट्री के पांच रंगों से बने , हाड़ मास के इन्सान है. तो जाहिर है , हमारे सभी काम परिपूर्ण होने चाहिए . क्या हमारे जीवन की गति स्रुष्ट्री  की गति से कदम मिलाकार चलती है . अगर चलती हो तो हमारे  सभी ख्वाब अधूरे से क्यों है?हमारे मन रूपी रथ के घोड़ो की गति  , स्रुष्ट्री  की निर्धारित गति से तेज क्यों दौड़ती है?  हमारा बस चले तो हम सुष्ट्री की गति भी बदल दे.मगर हम यह भूल जाते है की, आखिर हम भी तो स्रुष्ट्री के पावन  स्पर्श से पुलकित है. स्रुष्ट्री   ने हमारे कर्मो की भी तो एक गति निश्चित की है. क्या हम इसे कभी पहचान पाते  है. स्रुष्ट्री  की गति से तालमेल बिठाकर चले तो सफलता निश्चित है. वरना हारने पर खुदखुशी करने वालो की संख्या कम नहीं है.
    दरअसल हमारा लालची मन कर्म का फल तुरंत मिलने की आस लगाये बैठा रहता है. और फल का पीछा करते करते दौड़ में शामिल हो जाता है  . दौड़ जहाँ से शुरू होती है वहा कारंवा बिछुड़ जाने का भय सताता है . . अपनोसे से बिछड़ने का दर्द सताता है. सबसे आगे निकल जाने की भूख इंसानी फितरत है. सपनोके बद्लोंको छूने के लिये  अग्रेसर हमारा मन न जाने कब दौड़ में शामिल हो जाता है ! ---.
दौड़ में हम से कोई आगे  न निकल जाये, यह डर मन को डंख मारता  रहता है. मगर सब से आगे  रहते हुए भी सबसे कब पिछड़ जाये कह  नहीं सकते. यहाँ तो कुछ भी निश्चित नहीं है. निश्चित  है तो बस----, मंजिल की और अग्रसर होते रहना.पुरे विश्वास से पुरे  इरादे से, ------विश्वास से उठाया हुआ हर कदम सफलता की  लम्बी दौड़ आसान  करता है. इस सफर में कई मुसाफिर मिल जाते है . कारवां बन जाता है. और सफलता का ताज पहनने का सौभाग्य भी प्राप्त होता है.
 
   .
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शनिवार, नवंबर 23, 2019

हम सम्हलते रहे की वह नाराज न हो,
और वह इस बात से ख़फ़ा   है की हम
सम्हलते क्यों नहीं।

गीले शिकवे मन की किवाड़ पर दस्तक देते रहे,
खोलकर किवाड़ हम भी उन्हें सहलाते रहे.

मन पर पड़ी दरारे बेवज़ह  गहरी होती गई
शब्द  तो  मिले थे पर जुबा खामोश  रही ,

हवा का झोका ही तो थे , वे शब्द तुम्हारे
दिल तोड़कर मेरा ले गये।
महफिल से तुम रुखसत क्या हुए
हम तन्हा  रह गये।
  रूठ  कर चल देना  आसा है. यारो,
सम्हलो तो जानो रिश्ते में भी कितनी  गहराई है  प्यारो।

१५ / ९ / १८ (मेरी कलम से )


गुरुवार, नवंबर 15, 2018

ऐ  मेरे मन बता----------

ऐ  मेरे मन बता तेरा आइना क्या है,
हर पल कुछ बोल रहा है, तुफा है शायद उमड़ रहा है,
छोड़ किनारे जीवन में उतर रहा है.

ऐ  मेरे मन बता तेरा आइना क्या है
कभी धुप सा कभी छाव  सा कभी सागर की गहराई हैै ,
 ऐ   मेरे मन बता तेरा आईना क्या है.

तेज  नदी की धरा सा, बहता   है आवारा सा,
जरा जरा सा बहका सा किस खोज में रहता है ,
 ऐ मेरे मन बता तेरा आइना क्या है,

उठता गिरता लड़खड़ाता, मस्ती में झूमता खिलखिलाता।
तेरे चेहरे है कई फिर भी तू गुमनाम सा ,
 मेरे मन बता तेरा आईना क्या है
( मेरी कलमसे )

शुक्रवार, मार्च 10, 2017

वह बुढ़िया

                                                           वह   बुढ़िया मंदिर में रोज दिखाई देती थी.मुझे उससे बहुत बाते करनी थी. वह भी शायद यंही चाहती थी .  उस बुढीया में अजीब सा  आकर्षण था. उसकी आखो में प्यार का अथाह सागर उमड़ रहा था.वह बहूत कृष थी, मगर उत्साह से भरपूर थी .उसकी बच्चो जैसी भोली हँसी मुझे अच्छी लगाती थी.  वह मुझे रोज  विभिन्न रूप में दिखाई  देती  . कभी बच्च्चो के साथ खिलखिलाते  तो कभी हमउम्र के साथ बाते करते. कभी मंदिर की   प्रदक्षिणा लगाती, तो कभी फूल तोडती नजर आती.झूले परबैठकर शान से  वह झुला लेती ,   उसके यह  विवध रूप मेरी आखो में समां चुके थे।ये  सभी रूप मुझमें   ताजगी का अहसास दिलाते .  ऑफिस जाते वक्त  उसके यह सभी रूप में रोज देखा करती .वह उम्र के अंतिम पड़ाव में थी.  फिर  भी  उसकी जीवन उर्जा मेरे लिए प्रेरना का स्त्रोत बन गई   थी .  .  सच बात तो यह थी की उसको देखने की मुझे    आदत सी पड़ गयी थी .किसीने मुझे बताया  था 'उसका अपना कोई नही है वह अपने मानस   पुत्री के साथ रहती है.'उसे अपना कोई होने की  क्या जरूरत जो सबका हो.!  अचानक  एक दिन वह बुढिया मंदिर पर नही दिखी. सोचा शायद कही   गई होगी.एक दिन, दो दीन, हप्ता गुजर गया मगर वह नही दिखाई दी. अब मेरी बेचैनी  बढने लगी . कहा गई होगी? ---- मेरी आखे मंदिर में उसे तलाश रही थी .उसके बिना मंदिर सुनासुना लग रहा  था .
 आखिर एक दिन उसके सथिदारो को मैंने पूछ ही लिया . किसीने कहा "भगवान को प्यारी हो गई बेचारी. "में  वही मंदिर के चबूतरे पर बैठ  गई. आखो से झर झर आसू बहने लगे.' किसी पराए  के लिये  क्या रोना', मन कह रहा था. पर आसू बह रहे थे. मंदिर में झुला अकेले ही हिलोरे ले रहा था. सबकुछ वैसा ही था .सिर्फ वह रिश्ता नहीं था, जिसने मुझे रुलाया था. इस रिश्ते का कुछ भी तो नाम नही था .जिसने मुझे रुलाया था.एक अंजान  रिश्ता जिसकी महक मंदिर में अभी भी फैली  हुई  थी

शुक्रवार, मार्च 03, 2017

वो चुप रहे तो.....


 वो चुप रहे तो.....

हमारे आस पास कई  छोटी छोटी उलझने यूँही मंडराती रहती है, इन  उलझनों का निराकरण सहज सम्भव है ,
अगर संवाद सकारात्मक हो, कई बार तो संवाद होते ही  नहीं है ,और अगर हुए भी तो विसंवाद बननेका डर रहता है ., शब्दोका सकारात्मक सहारा लेना ही पड़ता है.नहीं तो समस्या  और गहरी होती जाती है।   ,  चुप  रहने से बात नहीं  बनती ,   दिल के दाग और गहरे होते जाते है, यह शिकवे अंगार बन के दिलोंको जलाते रहते है ,अगर ऐसा ही रहा तो एक दिन मनका सुनामी उमड़कर बाहर आ ही जाता है, सुनामी की शुरुआत कहा से हुई कोइ नहीं समज  सकता, मौन रहने से समस्या  दूर नहीं हो सकती,शब्दों का चयन कर  इन के माध्यम से हम उलझन को सुलझा सकते है।   शांत कर  सकते है, इसलिए उलझन को सुलझाने में संवाद कमाल  का काम करता   है, मगर संवाद विसंवाद ना बने इसका ध्यान रखना जरुरी है

         
 हम सँभालते रहे की वह नाराज न हो
 और वह इस बात से नाराज है क
 हम सम्हलते क्यों नहीं
                                                   
 उनकी ख़ामोशी भी दिल के दर्द को
 पिघलाती है और उनको ये शिकायत है ,
 की हम कुछ नहीं कहते
                                                    
  एक गहरा सन्नाटा है , और
  दिल के दर्द की चीख सुनाई दे रही है
   यह दर्द भी मेरा सागर जैसा गहरा है,
 
 डर है, कही सुनामी बनकर होंटो तक
  न आ जाये

       


शुक्रवार, फ़रवरी 24, 2017

चेहरा अनजान सा क्यों है

     चेहरा अनजान सा क्यों है 

 

जीवन में एक तरफ सूर्य की  रौशनी है.  तो दूसरी तरफ काली परछाई भी है , 
 रौशनी यश, सम्रद्धि का  प्रतिक है,  तो काली परछाई हमारे जीवन का नकारात्मक 
स्वरुप दिखाती है, दोनों का अस्तित्व हमारे जीवन में  कायम है, मगर मजे की बात 
यह है की हमारी परछाई हमारे इशारोंपर नाचती है, हम चलते चलते थम से गए तो 
वह  भी थम सी जाती है,सूर्य की रौशनी हमपर सदैव बरसती रहती है, न तो इसे  हम 
छुपा सकते है ना ही  इसे रोक सकते है।जीवन में यश सम्रद्धि कायम है , अब यह हम 
 पर है की हम किसपर अपनी श्रद्धा रखते है सूर्य की रौशनी पर या परछाई पर ,
                    
                  इस पर दो पंक्तिया  लिखने की  कोशिश की है

धूप  जरासी  क्या खिल उठी,
परछाई भी मेरी मुझसे ऊपर हो उठी,
 चलते चलते हम थम से गये ,
 वह भी खामोश सी हो गई,
परछाई मेरी मेरे अस्तित्व  का ही अंश है,
फिर चेहरा अंजान सा क्यों है,